क्या इंसान सांप को जन्म दे सकता है? एक रोंगटे खड़े कर देने वाली पुरानी कहानी और विज्ञान का सच!
लेकिन यार क्या विज्ञान के इस युग में ऐसा होना संभव है? और क्या हमारे पूर्वजों की बातें सच थीं या यह सिर्फ एक कोरी कल्पना थी? आज मैं आपको अपने बाबा की वही रहस्यमयी कहानी तो सुनाऊंगा ही, लेकिन एक बायोलॉजी स्टूडेंट होने के नाते, हम इसे डीएनए और मेडिकल साइंस की कसौटी पर भी कसेंगे। देखते हैं कि इन किस्सों-कहानियो में कितना विज्ञान है और कितनी कोरी कल्पना।
गाँव का वो पुराना दौर और सूने आँगन का दर्द
मेरे बाबा बताते थे कि यह बात उस दौर की है जब गांवों में पक्के मकान नहीं हुआ करते थे। बिजली का नामोनिशान नहीं था और शाम ढलते ही पूरा गाँव दीयों और लालटेन की पीली रोशनी में डूब जाता था। उसी गाँव के एक कोने में मिट्टी के घर में एक साधारण सी औरत रहती थी। शादी को दस साल से ज्यादा बीत चुके थे, लेकिन उसकी गोद सूनी थी।
और आप जानते ही है की पुराने समाज में बाँझपन किसी श्राप से कम नहीं माना जाता था। वह औरत रोज गाँव वालों के ताने सुनती। अपने सूने आँगन को देखकर वह रात-रात भर रोती रहती थी। कहते हैं कि संतान पाने की तड़प में उसने हर मंदिर, हर दरगाह और हर पेड़ के आगे मन्नतें मांगीं। वह दर-दर भटकी, ताकि किसी तरह उसे माँ बनने का सुख मिल सके।
फिर आई वो खौफनाक रात... मन्नत तो पूरी हुई, पर इंसान की नहीं!
आखिरकार उसकी मन्नतें रंग लाईं और वह गर्भवती हो गई। नौ महीने का समय जैसे-तैसे कटा। पूरे घर में खुशियों का माहौल था। लेकिन जिस रात डिलीवरी होनी थी, उस रात कुछ ऐसा हुआ जिसने पूरे गाँव को खौफ में डाल दिया। पैरों के नीचे का जमीन खिसका दिया |
पूरे गाँव में हाहाकार मच गया। लोगों की भीड़ इकट्ठा हो गई। पंचायत बैठ गई और सबने एक सुर में कहा कि यह कोई भयानक श्राप है। यह एक राक्षस है और इस मनहूस सांप को तुरंत मार देना चाहिए, वरना गाँव पर कोई बड़ी विपत्ति आ जाएगी।
लेकिन दोस्तों आप तो जानते ही है माँ, माँ होती है एक माँ का दिल, दुनिया के हर तर्क और हर डर से बहुत ऊपर होता है। जब लोगों ने उस सांप को मारने के लिए लाठियां उठाईं, तो वह कमज़ोर और लहूलुहान माँ अपने बिस्तर से उठी और उस सांप को अपने सीने से लगा लिया। उसने रोते हुए गाँव वालों से कहा, "चाहे यह इंसान हो या जानवर हो, जन्मा तो मेरे ही कोख से है। अगर इसे मारना है, तो पहले मुझे मारना होगा।
खौफ के बीच पनपी ममता, और उस 'सांप' बेटे का अनोखा रिश्ता
दोस्तों मेरे बाबा कहते थे कि वह कोई आम सांप नहीं था। वह उस औरत को बिल्कुल अपनी माँ की तरह मानता था। यह सुनने में कितना भी अजीब लगे, लेकिन वह औरत उसे एक कटोरी में अपना दूध निकाल कर पिलाती थी।
गाँव वाले उस घर के पास से गुजरने में भी डरते थे, लेकिन उस घर के अंदर एक अलग ही दुनिया बस गई थी। जैसे-जैसे वह सांप बड़ा हुआ, वह अपनी माँ के हर काम में मदद करने लगा। जब माँ उसे कुछ लाने को कहती, तो वह अपने मुंह में दबाकर वह सामान ले आता था। अगर माँ को प्यास लगती, तो वह छोटी सी लुटिया (बर्तन) को अपने सिर और शरीर से धकेलते हुए माँ तक पहुंचा देता था।
रात को वह कहीं और नहीं, बल्कि अपनी माँ की चारपाई पर उसी के पैरों के पास लिपट कर सोता था। कोई भी अनजान शख्स या जानवर उस औरत को नुकसान पहुंचाने की सोच भी नहीं सकता था, क्योंकि वह सांप एक साये की तरह उसकी हिफाजत करता था।
एक मनहूस सर्द सुबह और चूल्हे की राख में लिपटा वो खौफनाक अंत
समय बीतता गया। एक बार गाँव में कड़ाके की सर्दियां आईं। उन दिनों घरों में मिट्टी के चूल्हे हुआ करते थे। रात को खाना पकने के बाद, उन चूल्हों में आग की राख काफी देर तक गर्म रहती थी।
जैसा की आपको पता ही होगा की.. सांप ठंडे खून वाले जीव होते हैं। सर्दियों में उनका खून जमने लगता है, इसलिए उन्हें गर्माहट की बहुत जरूरत होती है। एक रात कड़ाके की ठंड से बचने के लिए, वह सांप चुपचाप उस मिट्टी के चूल्हे की गर्म राख के अंदर जाकर सो गया। उसे वहां बहुत सुकून मिल रहा था।
अगली सुबह, माँ बहुत जल्दी उठ गई। उसे लगा उसका बेटा कहीं बाहर बाड़े में गया होगा। उसने बिना चूल्हे के अंदर देखे, सुबह की चाय और खाना पकाने के लिए चूल्हे में लकड़ियां लगाईं और आग जला दी। सूखी लकड़ियों ने तुरंत आग पकड़ ली और लपटें भड़क उठीं।
अचानक चूल्हे के अंदर से बुरी तरह फुफकारने और तड़पने की आवाजें आने लगीं। जब तक माँ कुछ समझ पाती और पानी डालकर आग बुझाती, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। वह सांप आग की लपटों से बुरी तरह जलता हुआ बाहर निकला। उसने अपनी माँ की तरफ एक आखिरी बार देखा, उसकी आँखों में कोई शिकायत नहीं थी, लेकिन दर्द असहनीय था। और वहीं तड़प-तड़प कर उसने दम तोड़ दिया।
जब माँ को अपनी गलती का एहसास हुआ, तो उसकी चीखें आसमान चीरने लगीं। वह पागलों की तरह रोने लगी। वह राख से सने उस जले हुए शरीर को सीने से लगाकर खुद को कोसती रही। बाबा कहते थे कि उस औरत ने उसी दिन से अन्न-जल त्याग दिया और उसी 'बेटे' की याद में तड़पते हुए कुछ ही हफ्तों बाद उसने भी अपने प्राण त्याग दिए।
दोस्तों जब मैं छोटा था, तो यह कहानी सुनकर मेरी भी आँखों में आंसू आ जाते थे। यह एक माँ-बेटे के निस्वार्थ प्यार की एक बहुत ही खूबसूरत लेकिन दर्दनाक मिसाल लगती है। बचपन में यह सब सच लगता था, लेकिन यूनिवर्सिटी की लैब में जब मैंने जीवन की उत्पत्ति को गहराई से समझा, तो सारा सपनों की दुनिया टूट के बिखर गया। चलिए, अब इस दर्दनाक कहानी को ज़रा विज्ञान की कसौटी पर कसते हैं और देखते हैं कि कुदरत के नियम क्या कहते हैं।
कुदरत का सबसे सख्त कानून और हमारे क्रोमोसोम
दोस्तों एक बायोलॉजी स्टूडेंट होने के नाते, बायोलॉजी का सबसे पहला और सख्त नियम यह है कि दो बिल्कुल अलग-अलग प्रजातियां आपस में मिलकर संतान पैदा नहीं कर सकतीं। हम इंसान मैमल्स (स्तनधारी) हैं, जबकि सांप रेप्टाइल्स (सरीसृप) की श्रेणी में आते हैं।
तो दोस्तों.. किसी भी जीव के जन्म के लिए नर और मादा के DNA और गुणसूत्र का आपस में मैच होना बहुत जरूरी है। इंसान के शरीर की हर कोशिका में 46 क्रोमोसोम यानि की 23 जोड़े होते हैं। वहीं, अलग-अलग प्रजाति के सांपों में इनकी संख्या अलग होती है।
लेकिन आप ही सोचो की.. इंसान और चिंपैंजी का DNA लगभग 98% एक जैसा होता है, फिर भी एक इंसान और चिंपैंजी मिलकर कभी संतान पैदा नहीं कर सकते। तो फिर सांप, जो इवोल्यूशन (विकासवाद) के पेड़ की बिल्कुल ही अलग शाखा पर हैं, उनका DNA इंसानी DNA के साथ मिलकर भ्रूण कैसे बना सकता है? यह प्राकृतिक रूप से पूरी तरह असंभव है।
सांप और दूध ये मेरी जूलॉजी क्लास का वो कड़वा सच
जब मैं बाबा की यह बात याद करता हूँ कि वह औरत सांप को अपना दूध पिलाती थी, तो मुझे अपनी न्यूट्रिशन और जूलॉजी की क्लास याद आती है। विज्ञान स्पष्ट रूप से बताता है कि सांप दूध पचा ही नहीं सकते।
स्तनधारियों के पेट में जन्म से ही 'लैक्टेज' नाम का एक एंजाइम होता है, जो दूध को पचाने का काम करता है। सांपों के शरीर में यह एंजाइम बिल्कुल नहीं पाया जाता। अगर कोई सांप दूध पी ले, तो वह दूध उसके पेट में जाकर फट जाएगा, उसकी आंतों में भयंकर इन्फेक्शन हो जाएगा और तड़प कर उसकी मौत हो जाएगी। नाग पंचमी के दिन सपेरे सांपों को कई दिनों तक भूखा-प्यासा रखते हैं। प्यास से तड़पता हुआ सांप दूध को पानी समझकर पी लेता है, जो कि उस बेजुबान पर एक बहुत बड़ा अत्याचार है।
माँ की कोख का तापमान और सांपों की फितरत
एक इंसानी बच्चा माँ के पेट में प्लेसेंटा के जरिये जुड़ा होता है। इंसानी शरीर का तापमान हमेशा एक समान लगभग 37°C रहता है, जिसे 'वार्म-ब्लडेड' कहते हैं। दूसरी तरफ, ज्यादातर सांप अंडे देते हैं और वे 'कोल्ड-ब्लडेड' होते हैं। एक इंसान के गर्भाशय का वातावरण किसी भी रेप्टाइल के पनपने के लिए बना ही नहीं है।
दोस्तों इसके अलावा, कहानी में जो इंसानी भावनाओं का जिक्र है—जैसे माँ की आज्ञा मानना या पानी लाना—वह भी विज्ञान के खिलाफ है। सांप के दिमाग में वह हिस्सा विकसित नहीं होता जो प्यार या वफादारी महसूस करवाता है। वे सिर्फ अपनी 'सर्वाइवल इंस्टिंक्ट' यानि की जिंदा रहने की मूल प्रवृत्ति पर काम करते हैं।
लेकिन मन में यह सवाल आता है की.. अगर ये नामुमकिन है, तो फिर ये कहानियाँ आईं कहाँ से? अगर यह सब वैज्ञानिक रूप से नामुमकिन है, तो पुराने जमाने में ऐसी अफवाहें और कहानियां इतनी मजबूती से कैसे फैल गईं? इसके पीछे मुख्य रूप से दो बड़े कारण हो सकते हैं:
जब बीमारियों को ही श्राप मान लिया जाता था
पुराने जमाने में अल्ट्रासाउंड मशीनें या एडवांस मेडिकल साइंस नहीं हुआ करती थी। मेडिकल साइंस में एक बेहद दुर्लभ जन्मजात बीमारी होती है जिसे सिरेनोमेलिया या 'मरमेड सिंड्रोम' कहते हैं।
इस जेनेटिक विकृति में, बच्चा जब माँ के पेट में होता है, तो उसके दोनों पैर आपस में जुड़ जाते हैं। जन्म के समय वह बच्चा नीचे से किसी मछली की पूंछ या सांप के निचले हिस्से जैसा दिखाई देता है। डर और अज्ञानता के कारण लोगों ने ऐसे दुर्भाग्यशाली बच्चे को 'सांप' मान लिया होगा।
दिमाग का खेल है ये झूठी गर्भावस्था
कहानी के शुरुआत में हमने देखा कि वह महिला सालों तक संतान न होने के कारण गहरे दबाव में थी। साइकोलॉजी में एक स्थिति होती है जिसे झूठी गर्भावस्था कहते हैं। इसमें एक महिला माँ बनने की इतनी गहरी इच्छा रखती है कि उसका दिमाग उसके शरीर को धोखा देने लगता है। महिला का पेट फूलने लगता है और उसे लगता है कि वह गर्भवती है। हो सकता है कि मानसिक संतुलन खो देने के कारण, उस महिला ने किसी जंगली सांप को अपना बच्चा मानकर पालना शुरू कर दिया हो।
कुल मिलाकर, ये कहानियाँ हमें बताती हैं कि हमारा समाज और इंसान का दिमाग कैसे काम करता है। हमारे बुजुर्ग शायद इसलिए भी ये किस्से सुनाते थे ताकि वे निस्वार्थ प्रेम, प्रकृति के जीवों के प्रति दया, और अनजाने खतरों जैसे चूल्हे की आग में सांप का छुपना इत्यादि के प्रति हमें जागरूक कर सकें।
एक बायोलॉजी स्टूडेंट के तौर पर मेरा मानना है कि भावनाओं का अपनी जगह महत्व है, लेकिन जब बात प्राकृतिक नियमों की आती है, तो हमें विज्ञान पर ही भरोसा करना चाहिए। इंसान कभी सांप को जन्म नहीं दे सकता—यह डीएनए की उस किताब में लिखा है, जिसे कुदरत ने खुद अपने हाथों से रचा है।
दोस्तों क्या आपके घर में भी बचपन में ऐसी कोई कहानी जरूर सुनी-सुनाई जाती होगी। अगली बार जब कोई ऐसा किस्सा सुनें, तो उस पर विज्ञान का चश्मा लगाकर जरूर सोचिएगा। अगर आपके पास भी ऐसी कोई कहानी है, तो मुझे कमेंट्स में बताइए, हम मिलकर उसका विज्ञान खंगालेंगे! चलिए मिलते है अगले और खूबसूरत ब्लाग में |



