ज़िंदगी के सबसे घने अंधेरे में जब बजरंगबली ने थामा हाथ
When Lord Bajrang Bali Held My Hand in the Dark
यार, आज मैं एक अपना ऐसा अनुभव बताऊँगा जो शायद ही कोई विश्वास करें, मैं वो बंदा था जो मंदिर के सामने से गुज़रता तो था, लेकिन कभी सिर नहीं झुकाता था। मन ही मन सोचता था कि ये सब बस ढोंग है। पत्थर की मूर्ति के सामने हाथ जोड़ने से क्या होगा? अगरबत्ती जलाने से कौन सी किस्मत बदल जाएगी? जो लोग रोज़ मंदिर जाते थे, उन्हें देखकर मुझे थोड़ी अजीब सी फीलिंग आती थी।
मैं ये सब ढकोसला समझता था। घर में माँ रोज़ सुबह उठकर नहाती थीं, अगरबत्ती जलाती थीं, हनुमान चालीसा पढ़ती थीं। मंगलवार को उनका मंदिर जाना तय था। मुझे ये सब बस एक पुरानी आदत लगती थी—एक ऐसी आदत जिस पर कोई सवाल नहीं उठाता।
मैं खुद को बहुत लॉजिकल मानता था। मेरा सीधा सा तर्क था: "अगर भगवान है, तो दुनिया में इतना दर्द क्यों है? अगर बजरंगबली इतने शक्तिशाली हैं, तो गरीब आदमी गरीब क्यों है?" जब नौकरी लगी, पैसे आने लगे, तो मेरा अहंकार और भी मज़बूत हो गया। मुझे लगने लगा कि ये सब मेरी मेहनत, मेरी प्लानिंग का नतीजा है। भगवान का इसमें कोई रोल नहीं है। लेकिन कहते हैं न, जब वक़्त का पहिया घूमता है, तो वो इंसान के सारे तर्कों को कुचल कर रख देता है।
जब किस्मत ने ज़मीन पर पटक दिया
ज़िंदगी जब पलटती है, तो वो कोई वॉर्निंग या सिग्नल नहीं देती। बस एक सुबह आप उठते हैं और सब कुछ सामान्य लगता है, लेकिन शाम तक आपके पैरों तले से ज़मीन खिसक चुकी होती है।
मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। मैं जिस कंपनी के लिए दिन-रात एक कर रहा था, वहाँ अचानक "पुनर्गठन" का नाम लेकर छंटनी शुरू हो गई। मुझे HR के केबिन में बुलाया गया और एक झटके में कह दिया गया, "आपकी पोज़िशन अब कंपनी में नहीं रही। आपके पास एक महीने का नोटिस पीरियड है।" इतने सालों की वफादारी, इतने सालों की मेहनत—सब कुछ एक पल में शून्य हो गया।
उस दिन जब मैं घर लौटा, तो सोफे पर जूतों समेत धम्म से बैठ गया। घंटों दीवार को घूरता रहा। दिमाग सुन्न था। पहले लगा कि कोई बात नहीं, टैलेंट है, अनुभव है, कहीं और नौकरी मिल जाएगी। मैंने रिज्यूमे अपडेट किया, लिंक्डइन पर मैसेज भेजे, रात-रात भर जागकर सैकड़ों एप्लीकेशंस डालीं।
अपनों का परायापन और खाली जेब की चीख
दिन हफ्तों में और हफ्ते महीनों में बदल गए। हर जगह से बस एक ही रटा-रटाया जवाब आता: "हम आपको बताएँगे, अभी पोज़िशन होल्ड पर है।" और वो बताने का दिन कभी नहीं आया।
धीरे-धीरे मेरी सेविंग्स खत्म होने लगीं। बड़े खर्चे बंद हुए, फिर छोटे खर्चों के लिए भी सोचना पड़ने लगा। एक ऐसा भी वक्त आया जब घर का राशन लाना भारी लगने लगा। जब जेब खाली होती है ना यार, तब दुनिया का असली चेहरा नज़र आता है। वो दोस्त जो रोज़ पार्टी करते थे, उन्होंने फोन उठाना बंद कर दिया। एक सबसे करीबी दोस्त से जब मैंने मजबूरी में पैसे मांगे, तो उसने जिस हिकारत से मुझे मना किया, वो चेहरा मैं आज तक नहीं भूल पाया हूँ।
घर का माहौल भी ज़हरीला होने लगा था। जिनके लिए मैं कल तक एक सफल इंसान था, आज उनके लिए एक बोझ बन गया था। एक दिन घर में किसी ने ताना मारते हुए कहा, "जिसने कभी भगवान को याद नहीं किया, उसके साथ ऐसा ही होता है। अब भुगतो।" वो बात एक जंग लगी कील की तरह मेरे सीने में उतर गई। बाहर वालों का दर्द तो इंसान सह लेता है, पर जब अपने ही साथ छोड़ दें, तो इंसान कहाँ जाए?
वो खौफनाक रात और छत पर टूटा हुआ मैं
रातें सबसे खौफनाक होती थीं। दिन तो नौकरी ढूंढने की भागदौड़ में कट जाता, पर रात के सन्नाटे में मेरा दिमाग मुझे ही खाने लगता। "क्या मैंने कुछ गलत किया है? क्या मेरी ज़िंदगी अब ऐसे ही घिसटते हुए कटेगी?" इन सवालों का कोई जवाब नहीं था।
एक रात, करीब 2 बज रहे थे। कड़ाके की ठंड थी। मुझसे बिस्तर पर लेटा नहीं गया। मैं भागकर छत पर गया। वहां एक पुरानी कुर्सी पड़ी थी, उस पर बैठ गया और आसमान को देखते हुए फूट-फूट कर रोने लगा। बिना आवाज़ किए, अपने ही आंसुओं को पीते हुए। मैं मेहनत से नहीं थका था, मैं उस अकेलेपन से थक गया था। दुनिया में एक भी इंसान ऐसा नहीं था जिसके कंधे पर सिर रखकर मैं कह सकूँ कि "यार, मैं हार रहा हूँ।"
एक अनजानी पुकार: चलो हनुमान मंदिर
उसी रात, रोते-रोते ना जाने कहाँ से मेरे दिमाग में एक ख्याल कौंधा—"हनुमान मंदिर चला जा।" कोई आवाज़ नहीं थी, कोई दैवीय रोशनी नहीं थी। बस एक शांत सा विचार था। मेरे तार्किक दिमाग ने उसे तुरंत खारिज कर दिया—"पागल हो गया है क्या? पत्थर की मूर्ति तेरा दर्द कैसे समझेगी?" पर वो ख्याल जाने का नाम ही नहीं ले रहा था। हारकर मैंने खुद से कहा, "ठीक है, कल सुबह जाऊँगा। इसलिए नहीं कि मुझे भगवान पर भरोसा है, बल्कि इसलिए कि अब मेरे पास जाने के लिए कोई और दरवाज़ा नहीं बचा है।"
मंदिर की चौखट और आंसुओं का सैलाब
अगली सुबह मैं उठा। घर के पास ही वो छोटा सा हनुमान मंदिर था, जिसके सामने से मैं रोज़ गुज़रता था पर कभी अंदर कदम नहीं रखा था। आज मैं अंदर गया।
वहाँ भीड़ नहीं थी। एक बूढ़े पुजारी जी दीप जला रहे थे। मैं जूते उतारकर सीधे बजरंगबली की मूर्ति के सामने जाकर खड़ा हो गया। और यार... मुझे नहीं पता क्या हुआ, पर मैं वहां खड़े होते ही बच्चों की तरह रो पड़ा। मेरे अंदर पिछले कई महीनों का दबा हुआ सारा ज़हर, सारा दर्द, सारी घुटन आंसुओं के रास्ते बहने लगी।
पुजारी जी ने मुझे देखा, पर कुछ नहीं बोले। उन्होंने मुझे मेरे हाल पर रोने दिया। जब मैं थोड़ा शांत हुआ, तो मैंने मूर्ति की आँखों में देखकर बिना आवाज़ के सिर्फ इतना कहा—"देख ले, तू सब जानता है। मुझसे नहीं होता अब। मैं अकेले नहीं लड़ सकता।" मैंने कोई मन्नत नहीं मांगी, सवा रुपये का प्रसाद चढ़ाने का वादा नहीं किया। बस अपना बोझ उनके चरणों में पटक दिया और वापस आ गया। उस दिन, महीनों बाद, मैं बिना करवटें बदले गहरी नींद सोया।
वो 7 दिन जिन्होंने मेरी दुनिया बदल दी
यहाँ से शुरू हुए वो 7 दिन, जिन्हें अगर मैं किसी को बताऊँ तो वो इसे इत्तेफाक कहेगा, पर मेरे लिए वो सीधा बजरंगबली का जवाब था मंदिर से आने के बाद मेरे अंदर की वो घबराहट गायब हो गई जो चौबीसों घंटे मेरा गला दबाए रखती थी।
माँ ने अचानक मुझे गले लगाया और कहा, "सब ठीक होगा" मैं फिर मंदिर गया। इस बार डर से नहीं, एक खिंचाव से। पुजारी जी ने मुझे एक 'हनुमान चालीसा की किताब' दी और कहा, "रोज़ पढ़ो, बाकी वो देखेगा।" रात को मैंने पहली बार उसे पढ़ा—"भूत पिशाच निकट नहीं आवै, महावीर जब नाम सुनावै।" इस लाइन ने मेरे अंदर के सारे डर खत्म कर दिए।
सुबह हनुमान चालीसा पढ़ी और इंटरव्यू देने गया। वो इतने शानदार तरीके से हुआ जैसा पिछले कई महीनों में नहीं हुआ था। उस पुराने दोस्त ने कॉल करके कहा कि मेरा काम बहुत अच्छा है और उसने मुझे एक और बड़ा प्रोजेक्ट दे दिया।
अब हनुमान चालीसा सिर्फ शब्द नहीं, मेरी सांसें हैं
लोग कहते हैं कि ये सब सिर्फ संयोग था। शायद हो। लेकिन उन 7 दिनों में सिर्फ मेरी नौकरी नहीं लगी, मेरा अंदर का इंसान बदल गया। वो जो अकेलापन मुझे रात को नोच खाता था, वो खत्म हो गया।
आज भी ज़िंदगी में मुश्किलें आती हैं, तनाव होता है। पर अब मेरा पहला रिएक्शन घबराना नहीं होता। मेरा पहला रिएक्शन होता है—"हनुमान चालीसा पढ़, और बाकी उस पर छोड़ दे।" अब मैं चाहे रात को 2 बजे ऑफिस से थका हुआ लौटूंगा, या बुखार में तप रहा हूँ, मेरी हनुमान चालीसा कभी नहीं छूटती। यह अब कोई पूजा का नियम नहीं है, यह मेरा उस रात का वादा है जब मैंने उनसे कहा था "तू देख ले," और उन्होंने वाक़ई देख लिया।
तो दोस्तों आपको यह ब्लॉग कैसा लगा कमेंट्स में जरूर बताए और अगर तुम भी इस वक्त टूट चुके हो, तुम्हें लग रहा है कि तुम्हारे लिए सारे रास्ते बंद हो गए हैं, तो मेरी मानो—एक बार बस उस चौखट पर जाकर खड़े हो जाओ। कुछ मांगना मत, बस अपने दिल का सारी बाते निकाल दो। वो किसी को जज नहीं करते, वो बस थाम लेते हैं।
जय बजरंगबली! 🙏
जय श्री राम मेरे दोस्तों..


